PAPI HARISHCHANDRA

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“कन्हैया”गुरु चांडाल(आतंकवादी)योग ….

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कन्हैया अपने अंदर के ब्राह्मणत्व (गुरु ) को जगाओ |.

.आज भारत का लोक तंत्र उत्तराखंड मैं घायल हो चूका है | लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया को मुंह छुपाते शर्मसार होना पड़ रहा है | ग्रहण एक राहु के कारण होता है किन्तु बदनाम पूरे अंतरिक्ष के तारे हो जाते हैं | …..उत्तराखंड मैं कौन गुरु है कौन चांडाल पहिचानना मुस्किल हो गया है | क्या होगा उत्तराखंड का गुरु चांडाल योग के प्रभाव से………. |

.……………………..ज्योतिष के अनुसार इस समय संसार गुरु चांडाल योग से ग्रषित है | गुरु शब्द यानि नैतिकता और तन से मन से और कर्म से संस्कारी ज्ञानवान व्यक्ति | यदि संस्कारी ब्राह्मण (ईश्वर का ज्ञान वाला ) हो तो अति उत्तम गुरु सिद्ध माना जाता है | एक सिद्धि प्राप्त व्यक्ति ही गुरु कहा जा सकता है ,जिससे सिद्धियां पाने हेतु शिष्य आते हैं | देव गुरु बृहस्पति को सर्वाधिक सात्विक समय गृह माना जाता है | ……………………वहीँ दुनियां का सबसे घृणित गन्दा शमसान मैं टैक्स लेने वाला चांडाल माना जाता है |.अब चांडाल शब्द सिर्फ उपमा हेतु ही प्रयोग होता है | ग्रहों मैं सर्वाधिक गन्दा (काला ).गृह राहु माना जाता है | जो सिर्फ विनाश ही करता है | चांडाल की उपमा उसी को दी जाती थी | वर्तमान समय मैं चांडाल सर्वाधिक क्रूर आतंकवादी को ही कहा जा सकता है |.देश द्रोही ,पार्टी द्रोही ,जाति द्रोही ,विचार द्रोही ,से भी चाण्डालों सा व्यव्हार किया जाता है | ..………………...सर्वाधिक स्वच्छ तन मन और कर्म से सात्विक गुरु ( बृहस्पति ) का, सर्वाधिक क्रूर तन मन और कर्म से गन्दा काला गन्दा राहु (आतंकवादी ) का योग यानि साथ ……….क्या गुल खिलाएगा ………? astrology guru chandal yog - ..बृहस्पति और राहु जब साथ होते हैं तो गुरू चाण्डाल योग बनता है। कहा गया कि चाण्डाल की छाया भी ब्राrाण को या गुरू को अशुद्ध कर देती है।किन्तु कलियुग मैं चांडाल की छाया जीने की कला सिखाती है | गुरु को अपनी रक्षा के लिए राहु या राहु बुद्धि रूपी संरक्षक की जरुरत होती है |

.. राहु और बृहस्पति का सम्बन्ध होने से शिष्य का गुरू के प्रति द्रोह देखने में आता है। ……………यदि राहु बलशाली हुए तो शिष्य, गुरू के कार्य को अपना बना कर प्रस्तुत करते हैं या गुरू के ही सिद्धांतों का ही खण्डन करते हैं। बहुत से मामलों में शिष्यों की उपस्थिति में ही गुरू का अपमान होता है और शिष्य चुप रहते हैं। यहां शिष्य ही सब कुछ हो जाना चाहते हैं और कालान्तर में गुरू का नाम भी नहीं लेना चाहते। ……………………………………………….यदि राहु बहुत शक्तिशाली नहीं हुए परन्तु गुरू से युति है तो इससे कुछ हीन स्थिति नजर में आती है। इसमें अधीनस्थ अपने अधिकारी का मान नहीं करते। गुरू-शिष्य में विवाद मिलते हैं। शोध सामग्री की चोरी या उसके प्रयोग के उदाहरण मिलते हैं, धोखा-फरेब यहां खूब देखने को मिलेगा |……………………………….परन्तु राहु और गुरू युति में यदि गुरू बलवान हुए तो गुरू अत्यधिक समर्थ सिद्ध होते हैं और शिष्यों को मार्गदर्शन देकर उनसे बहुत बडे़ कार्य या शोध करवाने में समर्थ हो जाते हैं।……………………………………. शिष्य भी यदि ….कोई ऎसा अनुसंधान करते हैं जिनके अन्तर्गत गुरू के द्वारा दिये गये सिद्धान्तों में ही शोधन सम्भव हो जाए तो वे गुरू की आज्ञा लेते हैं या गुरू के आशीर्वाद से ऎसा करते हैं। यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है जब गुरू चाण्डाल योग में राहु का प्रभाव कम हो जाता है और गुरू का प्रभाव बढ़ने लगता है।…………………………………………………. राहु अत्यन्त शक्तिशाली हैं और इनका नैसर्गिक बल सर्वाधिक है तथा बहुत कम प्रतिशत में गुरू का प्रभाव राहु के प्रभाव को कम कर पाता है। ………………………………गुरू चाण्डाल योग का एकदम उल्टा तब देखने को मिलता है जब गुरू और राहु एक दूसरे से सप्तम भाव में (आमने सामने ) हो और गुरू के साथ केतु स्थित हों। बृहस्पति के प्रभावों को पराकाष्ठा तक पहुँचाने में केतु सर्वश्रेष्ठ हैं। केतु त्याग चाहते हैं, कदाचित बाद में वृत्तियों का त्याग भी देखने को मिलता है। केतु भोग-विलासिता से दूर बुद्धि विलास या मानसिक विलासिता के पक्षधर हैं ,और गुरू को, गुरू से युति के कारण अपने जीवन में श्रेष्ठ गुरू या श्रेष्ठ शिष्य पाने के अधिकार दिलाते हैं। इनको जीवन में श्रेय भी मिलता है और गुरू या शिष्य उनको आगे बढ़ाने के लिए अपना योगदान देते हैं।

क्या जे एन यू गुरु चांडाल योग से ग्रसित है ……? …….,क्या जम्बू कश्मीर गुरु चांडाल योग से ग्रसित है …………? ……….. क्या उत्तराखंड मैं गुरु चांडाल योग अपनी छाया फैला चूका है ..……? ……………...क्या दुनियां मैं गुरु प्रभाव हीन हो चुके हैं | सर्वत्र राहु रूपी चांडाल प्रबृति पसर चुकी है | चाणक्य के अनुसार एक सी छवि ठगी जाती है | जैसे दीखते हो वैसे मत बनो | यदि पापी हो तो माथे पर तिलक त्रिपुंड लगाते धर्मात्मा सी बातें करो | रावण भी पापी होते हुए भी ब्राह्मण बना रहता था | ……..सबसे नैतिक धर्म कर्म की बातें करने वाली राजनीतिक पार्टी भी अपने कुनबे मैं हिस्ट्री सीटर को सम्मान देती है | विधायक ,सांसद बनाती है | ……………………..आर्ट ऑफ़ लीविंग यही कहती है एक दम गुरु से पीले मत बने रहो ,न ही एक दम राहु जैसा काला……| गुरु चांडाल योग बना कर जीयो तभी जीवन सुगम होगा | ..राहु से प्रभावित …..अमावस्या की काली रात मैं गुरु के असंख्य दिए भी ज्ञान की रोशनी दे पाते हैं | …वहीँ सूर्योदय होते ही गुरु ज्ञान से राहु का अँधेरा छट जाता है | …………………………………………………….. …..उत्तराखंड मैं कौन गुरु है कौन चांडाल पहिचानना मुस्किल हो गया है | क्या होगा उत्तराखंड का गुरु चांडाल योग के प्रभाव से………. | …………………………राहु नाम के चाण्डालों की कहीं कमी नहीं है | लेकिन गुरु रूपी सात्विकता कहीं भी नजर आती है | जिसको गुरु मनो वही अपना राहु रूपी चाण्डाली प्रबृति दिखा देता है | यही राहु के चाण्डाली काळा रंग का कमाल होता है | काले रंग मैं कोई भी रंग अपना प्रभाव नहीं दिखा पाता है | गुरु भी अपने पीले रंग को नहीं उभार पाते हैं |.……………...अजीब होती है राजनीती ……..जहाँ ज्योतिष मैं गुरु चांडाल योग को बहुत ही अनिष्टकारी माना जाता है | सूखा ,बाढ़ ,अतिब्रस्ति ,युद्ध , महामारी ,आदि प्रलय कारी आपदाएं ,आतंकवादी आपदाएं सभी से ग्रसित होती है दुनियां ….| राहु अपने प्रभाव से गुरु की सात्विकता का नाश कर देता है | किन्तु राजनीती इसमें भी चाणक्य नीति से सत्ता सुख भोग लेती है | राजनीतिज्ञ के लिए योग अच्छा हो या बुरा कोई फरक नहीं पड़ता है | चाणक्य मुर्ख राजनीतिज्ञ थे जो सत्ता सुख को नहीं स्वीकारा ,कलियुग के चाणक्य गुरु बुद्धिमान होते हैं | वे त्याग की शिक्षा तो दे सकते हैं ,प्रवचन तो दे सकते हैं किन्तु स्वयं त्यागी होना उन्हें कठिन लगता है |……………………………………………………………ओम शांति शांति शांति



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Shobha के द्वारा
March 28, 2016

श्री हरीश जी ” लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया को मुंह छुपाते शर्मसार होना पड़ रहा है | ग्रहण एक राहु के कारण होता है किन्तु बदनाम पूरे अंतरिक्ष के तारे हो जाते हैं |”"वर्तमान समय मैं चांडाल सर्वाधिक क्रूर आतंकवादी को ही कहा जा सकता है |.देश द्रोही ,पार्टी द्रोही ,जाति द्रोही ,विचार द्रोही ,से भी चाण्डालों सा व्यव्हार किया जाता है |”"कलियुग मैं चांडाल की छाया जीने की कला सिखाती है | गुरु को अपनी रक्षा के लिए राहु या राहु बुद्धि रूपी संरक्षक की जरुरत होती है |” बिलकुल सही ‘सबसे नैतिक धर्म कर्म की बातें करने वाली राजनीतिक पार्टी भी अपने कुनबे मैं हिस्ट्री सीटर को सम्मान देती है | विधायक ,सांसद बनाती है | यही हाल है .किन्तु राजनीती इसमें भी चाणक्य नीति से सत्ता सुख भोग लेती है | राजनीतिज्ञ के लिए योग अच्छा हो या बुरा कोई फरक नहीं पड़ता है | चाणक्य मुर्ख राजनीतिज्ञ थे जो सत्ता सुख को नहीं स्वीकारा ,कलियुग के चाणक्य गुरु बुद्धिमान होते हैं | वे त्याग की शिक्षा तो दे सकते हैं ,प्रवचन तो दे सकते हैं किन्तु स्वयं त्यागी होना उन्हें कठिन लगता है |आलेख की हर पंक्ति मेने ध्यान से पढ़ी ग्रहों को सामने रख क्र आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है|

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 28, 2016

    आदरणीय शोभा जी आभार .  आचार विचार से चांडाल रूपी राहु तो पहिचाने जा सकते हैं । किंतु सात्विक लगने वाले कपटी प्रवचन करने वाले दगावाज देश द्रोही ,राष्ट्र द्रोही ,पार्टी द्रोही कब क्या कर बैठें । ओम शांति शांति 

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 28, 2016

    आदरणीय शोभा जी आभार . आचार विचार से चांडाल रूपी राहु तो पहिचाने जा सकते हैं । किंतु सात्विक लगने वाले कपटी प्रवचन करने वाले दगावाज देश द्रोही ,राष्ट्र द्रोही ,पार्टी द्रोही कब क्या कर बैठें । एक मन बचन और कर्म से सात्विक और मन बचन कर्म से दुष्ट का मेल ….. ओम शांति शांति


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