PAPI HARISHCHANDRA

SACH JO PAP HO JAYEY

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“कन्हैया”तुम भी निकल सको तो चलो (2)

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गतान्क  से  आगे ……….वर्तमान समय मैं ब्राह्मणत्व किसी मैं नहीं रह गया है | ब्रह्म ज्ञान (ईश्वर का ज्ञान) रखने वाला वेदपाठी ,यज्ञोपवीत धारण करते संध्याबंधन करने वाला कोई नहीं रह गया है | या तो वे व्यवसाय करके वैश्य हो गए हैं या सर्विस करने वाले शूद्र से हो चुके हैं | मांसाहार करते या न करते वे क्षत्रियों से कामी क्रोधी व्यव्हार करने लगे हैं | ब्राह्मण केवल वे ही रह गए हैं जो कर्मकांडी हैं | ……………………यज्ञोपवीत करके नित्य सुबह शाम संध्या वन्धन मैं गायत्री मंत्र का जप करना सात्विक खानपान से अपनी इन्द्रितों को वश मैं करना ही ब्राह्मणत्व को बनाये रख सकता है | क्या सनातन धर्म सभी वर्णों को यज्ञोपवीत का और गायत्री मंत्र जप के साथ संध्या बंधन का अधिकार प्रदान करता है ….? अपने आप को सात्विक बनाये रखने के लिए यह आवश्यक माना जाता है |आर्य समाज मैं यह अधिकार सभी वर्णों को प्रदान कर वेद का अध्यन का अधिकार देकर सनातन धर्म को सुगम बनाया | |………………………....मुस्लिम धर्म और ईसाई धर्म सभी को सामान अधिकार प्रदान करते हैं | इसीलिये शूद्रों का पलायन हुआ | ………………………………………………अब वर्ण व्यवश्था मैं केवल तीन ही कर्मानुसार धर्म रह गए हैं क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र…| जन्मानुसार संस्कारवश कोई अपना धर्म का पालन नहीं कर रहा है | ……..दुनियां के सभी धर्म केवल दो कर्मानुसार धर्म निभा रहे हैं वैश्य और शूद्र | ……………………कौन ब्राह्मण है कौन क्षत्रिय .वैश्य या शूद्र …? कौन हिन्दू कौन मुस्लमान ,सिख ईसाई …? ………शिक्षा प्राप्त करना सभी का अधिकार बन चूका है | व्यवसाय कोई भी कर सकता है | शूद्रों की तरह सेवा सर्विस भी कोई कर सकता है | जन्म से कोई किसी वर्ण का हो कर्म से वह किसी भी वर्ण को अपना सकता है | ……………………………………………………क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र ऐसे धर्म हैं जो सहजता से अपनाये जा सकते हैं किन्तु एक ब्राह्मण धर्म ही दुरूह धर्म मन जाता है | ……..इस जन्म मैं विद्या अध्यन करके ब्राह्मणत्व की और जा तो सकते हैं किन्तु ब्राह्मण बनने के लिए अगला जन्म ही लेना होता है | ……………………………...वैज्ञानिक तौर पर भी किसी भी जीव के स्वाभाव के वाहक उसके जींस ही होते हैं | वाहरी तौर पर कोई भी वर्ण दृष्टिगोचर हो सकता है किन्तु जन्म से जीव का स्वाभाव निश्चित जींस कर देते हैं | यही कारण है की जन्मजात वर्ण अपना स्वाभाव बता ही देता है | …………………………..समाज मैं फैलती वर्णसंकरता ने अब वर्ण व्यवस्था को पूर्णतः नष्ट भ्रष्ट कर दिया है | यही कारण है की समाज धर्म विहीन हो रसातल मैं जा रहा है | नैतिकता संस्कारों से मिलती है और संस्कार आँधी तूफान की तरह कहीं भी उड़ जाते हैं | …………………………………………यह सत्य है की ब्राह्मणत्व पाना बहुत कठिन है | इसीलिये ब्राह्मण, वैश्य शूद्र वर्ण को भी कर्मानुसार अपना रहे हैं | क्षत्री वैश्य शूद्र भी विद्या अध्धयन करते ब्राह्मणत्व की और जा रहे हैं | किन्तु संस्कार विहीन ब्रह्मत्व जीवन यापन का ही साधक बन पाता है | ब्राह्मण का धरम ब्रह्मत्व की और जाना न होकर जीवन यापन ही रह गया है | …..चारों वर्ण एक हिन्दू धर्म बन गए हैं | जो मुसलमानों को मांसाहारी मलेच्छ बता घृणा करता था किन्तु अब स्वयं म्लेच्छ सा होकर मुस्लमान बनता जा रहा है | वहीँ मुस्लमान भी सात्विकता की और झुकते हिंदुत्व प् रहे हैं | सब गडमड हो चूका है | वर्ण धर्म सब एक हो गए हैं | ………………………….सिर्फ दो धर्म रह गए हैं वैश्य (व्यापारी ) और शूद्र (सेवक नौकरी करने वाले ) …….|………….एक साइकिल मैं चारों वर्ण आते रहते हैं | जो स्ववभाविक समयानुसार बदलते रहते हैं | मौका सभी को समान दिया जाता है किन्तु संस्कार आड़े आ जाते हैं | कानून सबके लिए समान हो चूका है | ……………………………..श्रीमद भगवत गीता मैं भगवन भी कहते हैं …………………………..स्त्री ,वैश्य ,शूद्र तथा चांडल आदि जो कोई भी हों ,वे भी मेरे शरण होकर परम गति को पाते हैं |..…………………………………कन्हैया तुम ग्वाले ही तो थे किन्तु भगवन की तरह पूज्य हो गए | मगर भीड़ मैं अपनी पहिचान शूद्रों मैं मत करो | कानून से सबसे बड़ा शूद्र देश द्रोही ही होता है | ज्ञान पाकर भी संस्कारवान ब्राह्मणत्व नहीं प् सके तो शिक्षा बेकार है | भीड़ मैं से निकले असंख्य शूद्र आज संस्कार वान हो ब्राह्मणत्व पा चुके हैं | माननीय ,महामहीम ,वैज्ञानिक ,पंडित ,ज्योतिषी ,संत ,महात्मा ,प्रधानमंत्री ,राष्ट्रपति बनकर पूज्य हो चुके हैं | ……………………………………………………………………..कुछ बनना है तो अपने दामन मैं लगे दाग को धोना होगा | राजनीतिक पार्टियां तुम्हें भ्रमित कर रही हैं | भीम राओ अम्बेडकर की तरह ब्राह्मणत्व पाना है तो अपनी जवान पर लगाम देना होगा ,संयमित ही बोलना होगा | भावुकता या आवेश को त्यागना होगा | …….हर वह व्यक्ति दलित है जो गरीब है ,असक्त है ,दीन हीन है ,वर्ण चाहे कोई भी हो ,धर्म चाहे कोई भी हो लिंग कोई भी हो | भारत की ८० प्रतिसत से ज्यादा जनता आज दीन हीन होकर पूंजीपतियों की गुलाम है | कोई भी दीन हीन भीड़ मैं से निकलता महान हो जाता है | किन्तु दलितों से अलग हो जाता है | ……………………………अब तुम्हारे पास एक ही रास्ता है राजनीती ……..संतुलित कूटनीति ….| …जिससे ब्राह्मणत्व पाकर अपना उद्धार कर सकते हो | राजद्रोह या देश द्रोह से अपना दामन धोना है | शूद्रता से अपने को बचाना है | शूद्रता जन्म जात नहीं है | इसको धोया जा सकता है | सिद्ध करना होगा की तुम शूद्र नहीं हो | ज्ञान से कर्म से विद्वान हो ब्राह्मणत्व प्राप्त कर चुके हो | तुम्हार परिवार ,रिस्तेदार ,देश प्रदेश ,और जन्मजात दलित सभी आश भरी भावनाएं लिए हैं | देश के ८० प्रतिसत दलितों का उद्धार तूने करना है | ……जो लोग तुम्हें देश द्रोही शूद्र सिद्ध कर रहे हैं उन्हें दिखा दो मैं शूद्र नहीं दलितों का उद्धारक हूँ | कुछ तो हैं जो तुहैं शूद्र नहीं मानते …| भाग्य तुम्हारे

साथ है ,किन्तु संगत पथ भ्रष्ट कर रही है | अपना ध्यान केवल ८० प्रतिसत दलितों पर केंद्रित करो ,जो न ब्राह्मण हैं ,न क्षत्रिय ,वैश्य न शूद्र ,न हिन्दू न मुस्लमान सिख ईसाई ,या स्त्री पुरुष | जो गलतियां हो चुकी हैं उन पर सहजता से विनय पूर्वक क्षमा मांग लो | यही कुशल राजनीतिज्ञ की पहिचान होती है | ………विपक्षी राजनीतिक पार्टियां तुम्हें ब्राह्मणत्व की और ले जाना चाह   रही हैं | उनके उद्धार का भी कारक बन जाओगे | किसी भी हारे की कूटनीति यह भी होती है की कोई और या सभी मिलजुल कर दुश्मन को परास्त कर दिया जाये | उन हारे लोगों का मोहरा बनना भी नीति सांगत ही होगा | ….ओखली मैं सर दिया है तो मूसलों से क्या डरना ..………चक्रवूह मैं फँस चुके हो | कहीं नौकरी मिलेगी नहीं | व्यापर के लिए धन चाहिए फिर उसमें सफल हो सको या नहीं …? …………..भूल जाओ गीता के उपदेश को .…….जिसमें भगवन कृष्ण ने कहा है की ……………….”.अच्छी प्रकार आचरण मैं लाये हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म उत्तम है | अपने धर्म मैं मरना भी कल्याण कारक है और दूसरे का धर्म भय देने वाला है | क्योंकि स्वाभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म (ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र ) को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता | “…………………………………….भगवन तुम्हें सन्मति दे ताकि …………………………..ओम शांति शांति शांति .……….हो जाये

अगले अंक मैं



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
March 23, 2016

श्री हरीश जी जाती व्यवसथा अब केवल शादी ब्याहों में ही मानी जा रही है वः भी आज की जेनरेशन माने तो | सरकारी नौकरियों के दरवाजे और चुनाव के लिए सुरक्षित सीटों ख़ास कर ग्राम पंचायतों में स्वर्ण कोटा प्राप्त वर्ग की लडकियों से शादी करते देखे गये | चुनाव पत्नीं के नाम पर जीता जाता हैं पंच पतिदेव बन जाते हैं कई लोग अपने नाम के पीछे जाति लगाना भी छोड़ रहे हैं |बहुत अच्छा लेख शुरू में आपके लेख में प्रतिक्रिया नहीं जा रही थी मेने कोशिश की थी |

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 23, 2016

    आदरणीय शोभा जी लगता है होली मै लिपे पुते लोगों को पहिचानना मुस्किल होता है । लगता है वैसी ही क्राति आने वाली है । हरियाणा के मुख्य मंत्री अब खट्टर नहीं लिखेंगे । माॅझी जी अब सपरिवार आरझण का लाभ नहीं लेगे । अच्छा प्रयास है । सभी को साफ सुथरा नहीं बना सकते तो ब्राहमणों को भी रंगों से पोतकर सब एक जैसे तो लगेंगे । सात्विकता युक्रत समाज नहीं बना सकते तो रंगों से लिपे पुते से गडमड समाज तो बना ही सकते हैं ।ताकि होलिका मैया की जय सब एक स्वर मैं वोोल सके । कलियुगी ओम शांति शाति तो लगेगी ।

rameshagarwal के द्वारा
March 21, 2016

जय श्री राम हरिश्चंद्र जी बहुत सही भावनाए व्यक्त की वर्ण व्यवस्था समाज को सुचारू रूप से चलने के लिए थी जो कर्म पर आधारित थी आज सच्चे एअर्थ में बहुत कम लोग है जो ब्राह्मण कहलाने के योग है हम पूज्य मोरारी बापू रमेश भी ओझा प्रेसम भूषण जी को इशी क्षेणी में मानते है जो सच्चे एअर्थ में धर्म की सेवा हर रहे वैदिक संस्कृत में शुद्रो का भी आदर होता था अंग्रेजो के आने के बाद दलित शब्द का दुर्प्रोयोग होने लगा देशद्रोह का समर्थ शर्मनाक है कुछ दिनों बाद कन्हैया का नाम भी नहीं सुनाई देगा मोदी विरोधियो की चाल है ॐ शांति

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 22, 2016

    जय श्री ऱाम रमेश जी सब समय समय की बात होती है । वर्ण व्यवस्था कर कर्मानुसार धर्म को गीता मै भगवान क्रष्ण ने माना है । लेकिन वर्तमान मैं हम बाह्ममण को ब्राह्ममणत् गुणु से युक्त , क्षत्रिय को क्षत्रियत्व से युक्त , वैश्य को वैश्यत्व युक्त देखना चाहते हैं । हर दीन हीीन व्यक्ति को क्षुद्र मान लिया जाता है । संस्कारों का उत्थान और पतन भी कर्मानुसार होता रहता है । ओम शांति शांति

Jitendra Mathur के द्वारा
March 19, 2016

बिलकुल ठीक कहा है आपने कि अब तो दो ही वर्ण रह गए हैं - वैश्य और शूद्र । या तो धंधा करो या फिर नौकरी । ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी तो वही है जो ज्ञान प्राप्त करता है और उसका वास्तविक मूल्य समझकर उसे अपने जीवन और व्यक्तित्व में भी उतारता है । कहाँ मिलते हैं अब ऐसे ब्राह्मण ? यदि किसी दलित का उदाहरण दिया जाना हो तो मैं अंबेडकर के स्थान पर के.आर. नारायणन का नाम लेना चाहूंगा जो दलित परिवार में जन्म लेकर भी अपने आप को ब्राह्मणत्व तक ले गए । आपने कन्हैया को उचित परामर्श दिया है । ऐसा परामर्श कोई सच्चा शुभचिंतक ही दे सकता है । एकदम खरी-खरी बात कहते हैं आप । निस्संदेह !

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 20, 2016

    जितेन्दर जी आभार अब सही अर्थों मैं देखा जाये तो ब्राह्मणत्व अल्प संख्यक हो गये । सरकार को ऐसे वेद पाठी संस्कारि ब्राहमणो को सम्मानित करके प्रोत्साहित करे । जो क्षुद्ता को त्याग चुके हैं । या बाह्ममणत्व बनाये रखे हैं तभी ओम शांति शांति होगी

jlsingh के द्वारा
March 18, 2016

प्रेमचंद ने अपनी उपन्यास रंगभूमि के पात्र सूरदास से कहलवाया था- हार कर तुम्ही से खेलना सीखेंगे..लगान में आमिर खान ने साबित किया. अब देखें कन्हैया और उनके समर्थक क्या करते हैं. हम तो यही कहेंगे – कन्हैया कन्हैया तुमको आना पड़ेगा , वचन गीतवाला निभाना पड़ेगा…. ओम शन्ति शन्ति… सादर आदरणीय. आप भी चाणक्य ही हो.

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 20, 2016

    जवाहर लाल जी विना हीरे जवाहर के किसी भी राजा तक की शोभा नहीं हो पाती । धन्य हुआ जो जवाहरात से सुशोभित हुआ । ओम शांति शांति

sadguruji के द्वारा
March 17, 2016

आदरणीय हरिश्चन्द्र शर्मा जी ! सार्थक और विचारणीय लेखन के लिये बधाई ! भाग दो की उत्सुकता से प्रतीक्षा भी थी ! आपकी प्रस्तुति बहुत अच्छी रही ! रही बात कन्हैया की तो उसका भी हार्दिक पटेल वाला हाल होगा ! आपने सही कहा की फिलहाल वो भ्रमित है ! सादर आभार !

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 20, 2016

    सद्गुरु जी आभार आपके संदर्भ से एक गीत याद आया ,,अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊँ ,बीच भँवर मैं नाव है मेरी कैसे पार लगाऊँ ……लगता है यही भाव लिए सभी ओम शांति शांति के लिए प्रृयास रत हैं 

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    March 20, 2016

    सद्गुरु जी आभार आपके संदर्भ से एक गीत याद आया ,,अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊँ ,बीच भँवर मैं नाव है मेरी कैसे पार लगाऊँ ……लगता है यही भाव लिए सभी ओम शांति शांति के लिए प्रृयास रत हैं


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