PAPI HARISHCHANDRA

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एपीजे कलाम का याकूब को शांति पाठ

Posted On: 2 Aug, 2015 Politics,Religious,Others में

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एपीजे अब्दुल कलाम ,अध्यात्म और भौतिक विज्ञानं के योगी अपने नव जीवन गृह मैं इतने ध्यानमग्न थे की नए जीवन गृह का भास होते ही उनकी आत्मा ने शरीर त्याग दिया और जहाँ पहुँचने मैं सशरीर १०० साल से भी अधिक लग जाते वे इंटरनेट की तरह तुरंत जुड़ गए | एक ऐसा गृह जहाँ आत्माओं को शरीर नहीं मिलता | केवल महान ज्ञान वाली आत्माएं ही वहां विचरण कर रही थीं | आत्मा परमात्मा वहां सब एकाकार ही थीं | कुछ समय विचरण करने के पश्चात ,कलाम साहेब यह सोच ही रहे थे की इन आत्माओं को कैसे पृथ्वी की तरह शरीर प्रदान किया जाये | इनके उद्धार के लिए क्या कोई भौतिक साधन करने होंगे या भगीरथ की तरह ही तपश्या करके सिद्धी पानी होगी ….? ……...तभी भयंकर तूफान के साथ एक आत्मा ने प्रवेश किया | कलाम साहेब सोचने लगे यह भी कोई पुण्यात्मा ही होगी जो इस नव जीवन गृह मैं आई है | ध्यानमग्न होने पर पता लगा की यह तो बॉम्बे बम कांड के अभियुक्त याकूब मेनन की आत्मा है | लगता है इसको फांसी हो चुकी है तभी यह भयंकर तूफान लेकर आई है | …..कलाम साहेब का नव गृह सृजन का उत्साह ठंडा पड़ गया ऐसी आत्मा का आगाज मैं ही आगमन नव गृह को आतंकित न कर दे ,यह विचार आने लगे | …………. इसको यह पुण्यात्माओं का गृह कैसे मिल गया | इसे तो जहन्नुम मैं जाना चाहिए था | ध्यानमग्न होकर देखा यह तो रावण का भाई विभीषण सा लग रहा है | ….रावण ही कुकर्मी था किन्तु उसका भाई विभीषण तो राम भक्त था तभी तो शायद यह पुण्य लोक मैं आया है | याकूब भी शायद हिंदुस्तान भक्त था उसका भाई ही तो पाकिस्तान भक्त था | शायद इसी भक्ति के कारण इस नव जीवन गृह को प् सका है | अजीब है भगवन की माया जहाँ अच्छे बुरे की तराजू अलग ही होती है | …………………….चलो अब इसके क्या विचार हैं क्या यह इस गृह मैं रहने लायक बन चूका है या अभी उन्हीं आतंकवादी विचारों से आया है …? …..आतंकवादी के भाई होने से या कुसंगति से विगड़े विचार क्या नष्ट हो चुके हैं ….? यही विचार कर कलाम साहेब उस आत्मा के निकट गए | और उसकी धारणाओं को पड़ने लगे | धारणाएं और विचार किसी आत्मा के क्रिया कर्म होने तक बनी रहती हैं | अतृप आत्माओं की तो पता नहीं कब तक उन्हीं धारणाओं मैं भटकना पड़ता है | ऐसे मैं उसको शांति किन शब्दों मैं प्रदान की जाये उसी पर उस आत्मा का अगला मार्ग बनता है | इसे ज्ञान बर्धक मुक्ति कारक उपदेश की आवश्यकता अवश्य होगी वर्ना कुज्ञान इसको इस गृह पर भी भटका देगा | क्यों की तृप्त आत्मा कभी किसी का द्वेस नहीं सोचती है | ………………………………………………..ध्यानमग्न हो कलाम साहेब को कुरान और गीता स्मरण होता आया और उन्होंने एकाकार हो याकूब को ज्ञान का अहसास करना आरम्भ कर दिया …………………………………………नाश रहित तो तू उसको जान ,जिससे यह सम्पूर्ण जगत दृश्यवर्ग व्याप्त है | इस अविनाशी का विनाश करने मैं कोई भी समर्थ नहीं है | जो इस आत्मा को मरनेवाला समझता है तथा जो इसको मारा मानता है ,वे दोनों ही नहीं जानते ,क्योंकि यह आत्मा वास्तव मैं न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है | यह आत्मा किसी काल मैं भी न तो जन्मता है और न मरता ही है ,क्यों की यह अजन्मा ,नित्य सनातन और पुरातन है | शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता है | जो पुरुष इस आत्मा को नाश रहित ,नित्य ,अजन्मा और अव्यय जानता है वह कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है | ……………….जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है ,वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर नए शरीरों को प्राप्त होता है | ……….इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते ,इसको आग नहीं जल सकती ,इसको जल नहीं गला सकता और बायु नहीं सुखा सकता | …………इसलिए …..हे याकूब इस आत्मा को जानकर तू शोक करने योग्य नहीं है | तुझे शोक नहीं करना चाहिए | …………………………..सम्बुद्धीयुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक मैं त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है | यह समत्व ही कर्म बंधन से छूटने का उपाय है | …………….न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष मैं निश्चयात्मिका बुद्धी नहीं होती ,अंतकरण मैं भावना नहीं होती तथा भावना हीन व्यक्ति को शांति नहीं मिलती | सब भोग जिस व्यक्ति मैं बिना किसी प्रकार का विकार किये रहते हैं वह परम शांति को पाता है | जो सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममता रहित ,अहंकार रहित और स्पृहारहित विचरता है वही शांति को पाता है | …………………………………………………………………………………….तभी लगता है संत कबीर दास की आत्मा का इंटरनेट जुड़ जाता है …………कबीरा संगत साधु की ..………………………………………….तुलसीदास जी की आत्मा भी …………………………………………..जहाँ सुमति तहँ संपत्ति नाना ,जहाँ कुमति तहँ विपत्ति निदाना ||.………लेकिन सुमति का करक गृह बुध भी तो पाप ग्रहों शनि ,राहु ,केतु सूर्य से घिरा हुआ है | शुभ गृह बृहस्पति भी क्या कर सकता था जब संगती ने सब पथ भ्रष्ट कर दिया | …………....सम्मोहन शक्ति न होकर सम्मोहित हो जाते हैं ऐसे लोग …| ………………………..तभी अट्ठास करता चाणक्य की आत्मा लगती है ….मुर्ख क्यों तूने आत्म समर्पण किया | लेकिन मजबूर था शुभ गृह बृहस्पति के प्रभाव से ….| शुभ संस्कारों से …| …………………………………………………………..भगवन कृष्ण कहते हैं संसार मैं जो कुछ हुआ ,जो हो रहा है जो होगा सब मेरे द्वारा निश्चित है अतः जो कुछ हुआ वह सब प्रारब्ध ही था | अतः मन को शांत रखो और सत संगती का लाभ लेकर मुक्ति मार्ग पर चलो | ..…………….लगता है कलाम साहेब का शांति पाठ याकूब की वैचैन आत्मा को शांति प्रदान कर रहा है |.आत्माभिभोर याकूब की आत्मा , लगता है परमात्मा के साथ महान लोगों के साथ एकाकार हो रही है | ...एक इस्लाम ही ऐसा धर्म है जहाँ तौबा की जाती है | अब इस नव जीवन गृह मैं सारी आत्माएं केवल परमात्मा स्वरुप ही होंगी यहाँ कोई अच्छा बुरा नहीं होगा | नए जीवन का श्रष्टि का कलाम साहेब सुचारू सन्चालन कर सकेंगे | …………..ओम शांति शांति शांति



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