PAPI HARISHCHANDRA

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'प्राणायाम ध्यान'सुलभ योग,मेड इन इंडिया(३)

Posted On: 1 Jul, 2015 social issues,lifestyle,Religious में

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गतान्क….. ”ब्रह्मचर्य”सुलभ योग,मेड इन इंडिया (२)……….से आगे …………..योग सिद्धी स्त्रीयों के लिए नहीं ,मुसलमानों के लिए नहीं …| योग के लिए शरीर शुद्ध रहना चाहिए ,स्त्रियां पाँच दिन महीने मैं अशुद्ध रहती हैं | कभी गर्भवती होती हैं | बच्चों के लालन पालन मैं अशुद्ध रहते ,चित्त को एकाघृ नहीं कर सकती |…यज्ञोपवीत से जनेऊ नहीं पहिं सकती | संध्या बंधन करके ,गायत्री मन्त्र के जप से आत्म शोधन करके सद्चरित नहीं हो सकती | ………………………. योग सिद्धी का अधिकार केवल ब्रह्म ज्ञानी ब्राह्मण पुरुषों को होता है | …………. मुसलमानों का खानपान ,प्याज लहसुन वाला और मीट मांस युक्त होता है | वे कैसे अपनी चित्त बृत्ति को शांत कर पाएंगे | प्राणायाम ध्यान के लिए सात्विक खानपान जरूरी होता है | सात्विक विचार जरूरी होते हैं | हलाल का मीट खाने वाले कैसे दया भाव युक्त सात्विक विचार पैदा कर पाएंगे ….? ……………………………………………….प्राणायाम कोई साधारण क्रिया नहीं है | ..………………………..कपालभाति प्राणायाम ,भस्त्रिका प्राणायाम ,अनुलोम विलोम प्राणायाम ,भ्रामरी प्राणायाम ,बाह्य प्राणायाम ,उद्रीठ प्राणायाम ,प्रणव प्राणायाम ,उज्जायी प्राणायाम ,सीत्कारी प्राणायाम ,शीतली प्राणायाम ,सूर्यभेदी प्राणायाम ,चन्द्र भेदी प्राणायाम ,अग्निसार क्रिया , विशेष प्राणायाम ,अग्नी प्रदीप्त ,अग्नि प्रसारण ,एकांड स्तम्भ ,सर्वद्वारबद्ध ,सर्वांग स्तम्भ ,चतुर्मुखी ,चन्द्र भेदन ,यंत्र गमन ,वामरेचन ,दक्षिण रेचन ,शक्ति प्रयोग ,त्रिबन्ध रेचक ,हृदय स्तम्भ ,मध्य रेचन ,त्रिबन्ध कुम्भक ,ऊर्ध्वमुख भस्त्रिका , मुख पूरक कुम्भक , वायवीय कुम्भक ,वक्ष स्थल रेचन ,नदी शोधक ,नदी अवरोधक प्राणायाम …..आदि अनेकों प्राणायाम के लिए सात्विक होकर ही सिद्ध किया जा सकता है | …………………………………………….

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चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्

योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरोधयेत्॥२॥

(अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल हो जाता है और योगी स्थाणु हो जाता है। अतः योगी को श्वांसों का नियंत्रण करना चाहिये। ……………………………………………………...साधारण शब्दों मैं प्राणायाम अपने स्वास को लंबा खींचना रोकना और छोड़ना ही तो होता है | ……………………...अपने स्वास पर नियंत्रण ही प्राणायाम है तो दुनियां के सारे मुस्लमान ,गरीब मजदूर ,किसान ,,स्त्रियां ,सभी तो दिन रात हर कार्य कलाप मैं प्राणायाम करते हैं | एक बजन को उठाने मैं कितनी बार मजदूर लम्बी सांश खींचता है ,रोकता है और छोड़ता है | हर कर्मकार यही प्राणों का शोधन जिंदगी भर करता रहता है | एक गायक का तो अपने स्वाशों पर संयमित नियंत्रण होता है | एक डायलॉग बोलने के लिए भी स्वाशों पर नियंत्रण करना होता है | अपने अपने कामों मैं लिप्त हर व्यक्ति दिन भर प्राणायाम ही करता रहता है | एक वक्ता , प्रवक्ता , नेता अभिनेता ,पंडित ,मौलवी ,धर्म गुरु ,प्रवचन करता को भी अपनी स्वांश पर कंट्रोल होता है तभी वह लोक लुभावन तरीके से अपने सम्भाषण करके प्राणायाम करता है | ………………………...मुस्किल से दुनियां की आबादी के पाँच प्रतिसत लोग ही निठल्ले रहते होंगे जिन्हें योग की आवस्यकता होगी | या दीं दुनियां को त्याग चुके सन्यासियों के लिए जिनके पास करने को कुछ भी नहीं ..| …………………...दुनियां के केवल पाँच प्रतिसत लोगों के लिए ही यह योग है | …………………………………………………………...जिनमें एक प्रतिसत भी योग सिद्धी नहीं प् पाते | ……………………………………………..फिर भी योग आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार सिद्ध मार्ग है जिस पर चलकर साधक शांति पाते रहे हैं | ………..योग सिद्धी केवल शांति को पाना ही है | वह कर्म से ,भक्ति से ,भी सुगमता से पाई जाती है | …………………....एक छोटा छह महीने तक का बच्चा बिलबिलाता हुआ भयंकर तरीके से रोता जाता है | घर के सारे लोगों की कोशिशें उसे चुपा नहीं पाती | तब उसकी माँ को बुलाया जाता है ,माँ की गोद पाते ही बच्चा सुबकते सुबकते शांत हो जाता है ,और अंत मैं लम्बी स्वांश खींच कर सो जाता है | क्यों …? क्यों की उस के भगवन उसकी माँ ही है | उसे अपने भगवन का अहसास ही शांति देता है | तबी वह सो जाता है |……………………….………..योग का भी यही उद्देश्य होता है | योग भगवन का अहसास कराते शांति का अहसास करा देता है | सात्विक खानपान ,सात्विक विचार के रहते ही हम प्राणायाम कर सकते हैं | प्राणायाम भी इसलिए करना है क्यों की यह ध्यान का पहला कदम है | ध्यान मग्न होने के लिए पूर्व अभ्यास है | ध्यान मग्न व्यक्ति अपने लक्ष्य मैं इतना लीं हो जाता है की उसे अपनी जरुरत की स्वास भी नहीं ले पाता है ,उसे कुछ दिखाई नहीं देता ,कुछ सुनायी देता ,यहाँ तक की किसी गंध ,स्पर्श का भी भाष नहीं रहता | ..यह किसी चिता ग्रस्त या प्रेम प्यार मैं दीवाने व्यक्ति के साथ देखते रहते हैं | ……………….योग से हम भगवन को प् सकें या नहीं …..| ..जिसने पा भी लिया तो वह समाज के किस काम मैं आएगा | क्या वह अपने लिए कर पायेगा ….? …किन्तु योगाभ्यासी सात्विक खानपान से सात्विक विचार से ,अपने लक्ष्य साधना की सिद्धी अवस्य प् लेता है | लक्ष्य भगवन था …किन्तु मार्ग मैं जिस किसी की भी सिद्धी मिलती गयी बटोरते चले | विद्यार्थी को विद्या अध्यन की सिद्धी ,कर्मकार को अपने कार्य कुशलता की सिद्धी ,व्यापारी को अपने व्यापर की सिद्धी , नेता को अपने राजकाज की सिद्धी ,यहाँ तक की सन्यासी भी चाणक्य सी सिद्धी पाते अर्थ शास्त्र मैं पारंगत हो जाते हैं | …..क्या दो सन्यासी की सिद्धियां वर्तमान मैं काफी नहीं हैं |……..राम देव जी .और नरेंद्र मोदी जी की सिद्धी एक मिशाल बनी है | जिन्होंने योग से ही भिखारी जीवन से सब कुछ प् लिया | पाया ही नहीं पाते जा रहे हैं | ………….यह सिद्धी अनवरत चल सकती है यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते रहे | वर्ना संत आशाराम जैसे सिद्ध का हाल जग जाहिर है | ब्रह्मचर्य नाश होते ही स्वतः सिद्धियां ख़त्म हो जाती हैं | …………………………………ऊपर वर्णित प्राणायाम निबृति मार्गियों के लिए हैं यानि सन्यासियों के लिए जिन्होंने दीं दुनियां को त्यागकर भगवत चिंतन ही करना है | ……………………………………….साधारण गृहस्थ लोगों के लिए प्रबृति मार्ग ही कहा गया है | जो अपने कर्तव्य कर्मों को निभाते हुए भी योगारूढ़ होते अभ्यास कर सकता हैं | यहाँ हिन्दू मुस्लमान ,ब्राह्मण क्षत्रिय ,वैश्य ,स्त्री पुरुष का कोई बंधन नहीं होता | ऐसा योगारूढ़ व्यक्ति इस जन्म मैं सिद्धी नहीं भी प् सकेगा तो अगले जन्म मैं जितना सिद्ध हो चूका है उससे आगे अग्रसर होते सिद्ध हो जाता है |……… हे अर्जुन… यह दुखों के नाश करने वाला योग न तो बहुत खाने वाले का ,न बिलकुल न खाने वाले का ,न बहुत शयन करने वाले का ,न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है | ( श्रीमद्भागवत गीता ) …………………………….साधारण प्राणायाम के लिए शौच से निब्रट, स्नान करके और स्थान को शुद्ध करके शांत स्थान मैं पद्मासन मैं या सुविधानुसार बैठे | अपने सामने किसी आराध्य की मूर्ती या फोटो रखे | मूर्ती या फोटो उसी की रखें ,जिसका ध्यान करते प्राणायाम या ध्यान किया जायेगा | वातावरण को और भी सात्विक बनाने के लिए दीपक या धुप ,अगरबत्ती आदि जला ले | ……………………मन को शांत और एकाघृ करने के लिए कुछ समय तक अपने आराध्य की मूर्ती या तश्वीर को ही देखता रहे | मन के शांत होने के बाद ,अपनी नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि जमाकर अन्य दिशों को न देखकर ऑंखें बंद कर लें | नाक के अग्र भाग पर केंद्रित दृष्टि मैं अपने आराध्य की छवि की ही कामना करें | ………………..अब पाहिले दाहिने हाथ के अंगूठे से नासिका का दांया छिद्र बंद करके बाएं छिद्र से स्वांश अंदर खींचे | बंद आँखों मैं दृष्टि नाक के अग्र भाग पर केंद्रित और पेट का नाभि स्थान पर दबाब का अनुभव होना चाहिए | इसके लिए अपने आराध्य का ध्यान और गायत्री मन्त्र का जप धीरे धीरे करना होगा | अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक बार से आरम्भ करते ,अनेक बार तक जपते स्वांस खींचे | शरीर मैं शिथिलता का अनुभव करें | इसे पूरक अवस्था है ……………….पूरक के बाद अनामिका और ,कनिष्ठा अंगुली से नासिका के बाएं छिद्र को बंद रखकर स्वांस को रोकें ,गायत्री मन्त्र का जप अपनी सामर्थ्यानुसार करें | जप से पेट की नाभि का स्थान पर दबाब बनेगा | जिसको बनाये रखें | यह कुम्भक क्रिया है ………….इसके बाद अंगूठा हटा कर नासिका के दायें छिद्र से बायु को धीरे धीरे बाहर निकालें साथ साथ गायत्री मन्त्र का जप भी मन ही मन करते रहें | यह रेचक क्रिया है |…………………… इन तीनों को मिलकर ही प्राणायाम कहलाता है | …………..यही क्रिया बाई नाक के छिद्र के लिए भी दोहराई जाती है | ………………………………………..प्राणायाम करने के बाद शरीर से शुद्ध ,मन से शुद्ध ,शांत वातावरण अपने आराध्य की छवि मन मष्तिष्क मैं होती है | …………………………..अब ध्यान के लिए ऑंखें बंद करके ऑंखें नाक के केंद्र पर अपने आराध्य की छवि पाते,अपने आराध्य का कोई भी मन्त्र जो सुगम लगे धीरे धीरे जपना होगा | मन्त्र जपते नाभि पर दबाब का अनुभव होना चाहिए | यह जप पाहिले १५ दिन दस मिनट रखा जा सकता है | जैसे जैसे जप करेंगे मन मैं शांति का अनुभव होता जायेगा | शरीर मैं हल्कापन अनुभव होगा | जैसे जैसे अभ्यास होता जायेगा समय अपने आप ही बढ़ता जायेगा | मन शांत होकर समय का आभाष ही नहीं होगा | …………………जिस स्वास के नियंत्रण के लिए हमें प्राणायाम करना पड़ रहा था वह स्वांस कब ले रहे हैं कब निकाल रहे हैं यह आभास ही नहीं रहेगा | विलखते बच्चे के सुबकियों की तरह ही लम्बी स्वासें ही आती दूसरा अनुभव करेगा | यही ध्यान की पराकास्ठा होगी | …………………………………………………….…बस यहीं तक सुलभ योग होगा एक गृहस्थ के लिए ,कर्मयोगी के लिए कुण्डलिनी या समाधी से क्या लेना देना | भक्ति मैं डुबो इतना ही बहुत है | …...कुण्डलिनी या समाधी से हमें मोक्ष्य नहीं चाहिए हमें तो मोदी जी के विकास सुख को इस जन्म मैं भी भोगना है और पुनर्जन्म लेकर बार बार भी भोगना है | …हम सत्कर्म करेंगे ,योगाभ्यास करेंगे और मरने के बाद स्वर्ग सुख भी भोगेंगे फिर जन्म लेंगे फिर योग करेंगे और शांति पाएंगे | …………………………………………ओम शांति शांति शांति……………………………अगले अंक मैं …………………..
योगश्चचित्तबृत्तिनिरोधः”,सुलभ योग,मेड इन इंडिया (४) – ………..क्रमशः



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 5, 2015

हरिश्चंद्र जी बहुत जानकारी से परिपूर्ण है यह ब्लॉग पढ़ना बहुत अच्छा लगा साभार

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    July 6, 2015

     गंगा हो या यमुना स्नान मन को शुद्रध करओम शांति शांति ला ही देता है । य़मुना जी आभार 

shakuntlamishra के द्वारा
July 2, 2015

हमें भारत का विकास सुख भोगना है ,सत्कर्म से जीवन सुख और योग से स्वास्थ सुख इस जनम में भी और अगले जनम में भी ! अगर ऐसा हो पाता ! पता नहीं इस होने का कोई उपाय है या नहीं ! बहुत बढ़िया लेख ! बधाई !

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    July 3, 2015

    shakuntlamishra जी आभार,प्रोत्साहन पाकर क्रतार्थ हुआ । उपाय है ,मन की शांति ,जिसके लिए सुलभ योग ,भगवत चिंतन …….कर्तव्य निर्वाहन ……बस ओम शांति शांति ।


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