PAPI HARISHCHANDRA

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घर वापसी ,धर्मांतरण पर योगी को योगेश्वर का भ्रम निवारण

Posted On: 14 Jan, 2015 हास्य व्यंग,Politics,Others में

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मेरे प्रिय मित्र योगी सारस्वत जी मेरे ब्लॉग ….. ”धर्मांतरण” राष्ट्रीय धर्मग्रन्थ ”गीता” की धर्म की परिभाषा भूल गए …मैं भ्रमित थे अतः उनके भ्रम निवारण निम्न वत किया है ….

श्री हरिस्चन्द्र जी सादर ! मुझे समझ नहीं आया की आप गीता के राष्ट्रिय ग्रन्थ होने पर सवाल खड़ा कर रहे हैं या धर्म परिवर्तन करने वालों पर या कराने वालों पर ? लेकिन मैं समझ कर चलता हूँ की आप धर्म परिवर्तन कराने वालों की सोच पर चोट कर रहे हैं !! गलत क्यों है ? कैसे है ये ? जो सबसे श्रेष्ठ , विचारशील धर्म को किसी दबाव में या बलात छोड़कर चले गए थे उन्हें अपने घर लाना गलत कैसे हो गया ? क्या कोई बेटा रूठकर घर से चला जाता है , तो क्या उसे मनाकर वापस लाना गलत है ? आपका जवाब आएगा तो इस परिचर्चा को और भी आगे बढ़ाएंगे !! http://yogi-saraswat.blogspot.in/………………………....योगी जी विषय चिंतन गंभीर था | उत्तर लम्बा था अतः ब्लॉग स्वरुप मैं आगे बढ़ते हैं | महात्मा गांधी राष्ट्र पिता कहे जाते हैं ,उनके मार्ग का कहीं अनुसरण होता है ..? वोटों की राजनीती मैं उनकी याद आ जाती है | साल मैं एक दिन उनको श्रद्धा सुमन अर्पित कर दिया जाता है | वही हाल हमारे धर्म ग्रन्थ गीता का है | गीता मैं क्या है कोई नहीं जानता है | जानता भी है तो अनुसरण नहीं करता है या किया जा सकता है | गीता क्या है ..? उससे हम क्या सीख ले सकते हैं ..? अगर उसमें कोई सीख है तो उसे क्यों नहीं अपना सकते ..? सब कुछ गडमड है | ……………………………..प्रसंग घर वापसी और धर्मांतरण का है | हमारे देश के प्रधान मंत्री जी ,रामदेव जी ,शंकराचार्य जी और सुषमा स्वराज जी सभी गीता के प्रकांड पंडित हैं | गीता मैं स्वधर्म पालन को ही उचित माना गया है | …………………………………… ”अच्छी प्रकार आचरण मैं लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है | अपने धर्म मैं मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय देने वाला होता है | स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप का भागी नहीं होता है | ”३(३५……………………………………..….ऐसा केवल उपदेश के भाव से नहीं कहा ,उसका कारण भी बताया गया है ,,,,,,,,,,,,,,……...गीता मैं एक शब्द वर्ण शंकर ,आजकल की भाषा मैं हरामी कहा जाता है ………दूसरे के धर्म को अपनाने वाला वर्ण शंकर ही हो जायेगा | वर्ण शंकर समाज मैं कितने घातक होते हैं यह आजकल के वर्ण शकर खुले आम कहते हैं | सर्वत्र भ्रष्टाचार ,खून खराबा ऐसे ही लोगों से उपजता है | संस्कार विहीन हो जाते हैं ऐसे लोग | ……………………………यह मैं नहीं कह रहा समाज देखता है महसूस करता है ,और गीता मैं भी कहा गया है | ……………..धर्म परिवर्तन को कुल नाश ही माना गया | जिसका कोई गोत्र न रहे वे किस कुल के कहे जायेंगे ..?…………. ………………………………...कुल के नाश से सनातन कुल धर्म नष्ट हो जाते हैं ,धर्म के नाश हो जाने से सम्पूर्ण कुल मैं पाप भी बहुत फ़ैल जाता है | पाप के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यंत दूषित हो जाती हैं | स्त्रीयों के दूषित हो जाने पर वर्ण शंकर उत्पन्न होता है | वर्ण शंकर कुल घतियों को और कुल को नरक मैं ले जाने के लिए ही होते हैं | लुप्त हुयी पिंड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से बंचित इनके पितर लोग भी अधोगति (नरक ) को जाते हैं | इन वर्ण शंकरात्मक दोषों से कुल घतियों के कुल धर्म और जाती धर्म नष्ट हो जाते हैं | जिनका कुल धर्म नष्ट हो गया हो ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक मैं निवास होता है | १(३८से ४० ) | ………………………..हिन्दू सनातन धर्म मैं चार वर्ण होते हैं कौन सा वर्ण मिलेगा धर्मान्तरण या घर वापसीयों को ..? …….कौन सा गोत्र दिया जायेगा...? क्यां ब्राह्मण बन यज्ञोपवीत धारण कर गायत्री मन्त्र जपेंगे | क्षत्रीय वैश्य शूद्र भी बनेंगे तो हिन्दू सनातन धर्म मैं विकृति ही फैलाएंगे | सनातन धर्म की वर्तमान विकृत स्तिथि ऐसे ही वर्ण शंकरों से हुयी है | धर्म की उल्टी सीधी व्याख्या करने वाले ऐसे ही अज्ञानी हो गए हैं | अन्यत्र वर्ण शंकर हो चुके संस्कार विहीन लोगों को घर वापसी कर क्या हिन्दू समाज मैं एक इन्फेक्शन का कारण नहीं लाएंगे |..? आजकल जो धर्म के नाम पर धन का भंडार लूट रहे हैं चाहे वे धर्म गुरु हों या ज्योतिसी कोई भी ब्राह्मण रूप के नहीं हैं | धर्म व्यापार रूप से हो रहा है | ………………………………………………धर्म और धर्म गुरु राजनीती का खिलौना हो गए हैं | जैसा राजनीती कहती है वैसा ही सुर अलापने लगते हैं | यदि गीता भगवन श्रीकृष्ण की वाणी है राष्ट्रीय धर्म ग्रन्थ बन रहा है तो क्यों नहीं उसका अनुपालन किया जाता है | क्या राष्ट्रीय धर्म ग्रन्थ को महात्मा गांधी की तरह एक सिम्बल ही रखा जायेगा ? उचित तो यही होगा की हिन्दू धर्म की विकृत हो चुकी स्तिथी को अंदर ही अंदर सुधारा जाये ,न की बाहर से प्रदुषण लेकर और भी वीमार कर दिया जाये |

…………..गीता मैं भगवन श्रीकृष्ण कहते हैं की ………………जो मनुष्य श्रद्धा युक्त और दोष दृष्टि रहित होकर गीता शास्त्र का श्रवण भी करेगा ,वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ट लोक को पायेगा | १८(७१)………………………………………..क्या गीता सिर्फ श्रवण स्तवन करके पाप मुक्त होने को है | शायद इसी लिए गीता को राष्ट्रीय धर्म ग्रन्थ घोषित किया जा रहा है | हरियाणा सरकार तो पाठ्यक्रम मैं लागु कर चुकी है | ………………………………………………………..राजनीती का कभी भी एक मुखौटा नहीं होता | साधु सन्यासी धर्म गुरु भी अपने अपने कामना कृत्यों से लिप्त होते हैं | जब कुछ शास्त्र विरुद्ध हो रहा है तो क्यों नहीं सन्मार्ग देते हैं | सन्मार्ग न भी दें तो भी समर्थन तो न करें | राजनीती को तो धर्म भीरु वेवकूफ हिन्दुओं की ही आवश्यकता होती है जिनके वोट बैंक से सत्ता पाते रहें | ……..कर्म से …50 प्रतिसत मुस्लिम हो चुके हिन्दू अब कितना मुस्लमान होना चाहेंगे | आजादी के पाहिले के हिन्दू आज के हिन्दू कितना अंतर आ चूका है | सर पर चोटी ,जनेऊ,वेद पाठ ,संध्या बंधन सब लुप्त हो चूका है | जब पानी मैं किसी तत्व को कम मात्रा मैं मिश्रित किया जाता है तो प्रभाव पानी का ही होता है जैसे जैसे मात्रा बड़ाई जाती है वैसा ही स्वाद बनता जाता है | अभी और मुस्लमान होना है तो ही घर वापसी या धर्मांतरण किया जाये | किन्तु राजनीती को क्या फर्क पड़ता है सत सत प्रतिसत के कर्म मुस्लिम हो जाएँ | धर्म निरपेक्षता की यह भी नयी मिसाल होगी | ……………ओम शांति शांति शांति तो हो ही जाएगी



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
January 15, 2015

गीता मैं एक शब्द वर्ण शंकर ,आजकल की भाषा मैं हरामी कहा जाता है ……… सादर नमन आदरणीय सर जी |

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    January 15, 2015

    दुबे जी आभार ओम शांति शांति 

jlsingh के द्वारा
January 15, 2015

बेहतरीन तर्क ज्ञान! अब योगी जी को समझना बाकी है. अगर वे प्रश्न उठायें फिर आगे शास्त्रार्थ होगा… गीता का भली भांति अध्ययन और अनुपालन होने से ही सार्थकता है वैसे गंगा नदी राष्ट्रीय नदी घोषित कब का हो चुकी है कुछ फर्क पड़ा है ? अब गंगा में पूजन सामग्री बहाने से भी जुर्माना लगनेवाला है … गंगा के बारे में और संगम तट पर स्नान के बारे में तुलसीदास ने भी लिखा है – मज्जन फल पेखीय तत्काला, काक होहिं पिक बकउ मराला… क्या आज यह पंक्तियाँ सत्य हो सकती है? बहुत ऊहापोह है …

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    January 15, 2015

    जवाहर जी आभार राष्टीय नदी मैं पुजन सामिग्री ,अस्थी प्रवाह प्रतिबंधित होगा । यही तो मुख्य आस्था है ।किन्तु सीवर प्रवाह ,फैक्ट्रीयों का कचरा पर वस नहीं चलेगा । गंगा का आवाहन तो मंत्रों  से ही हो जाता है । ओम शांति शांति 


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