PAPI HARISHCHANDRA

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मोदी मन्त्र ...बर्तमान मैं जीने वाला ही '' स्वधर्मी ''

Posted On: 16 Nov, 2014 हास्य व्यंग,Politics,Others में

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”आलोचना का एक निश्चित समय होता है ,आप जैसे मनीषी यदि संयम छोड़ कर राजधर्म की इस प्रकार व्याख्या करने लगेंगे तो सत्ता के गुरुर से विलग अपने कठिनतम धर्म का लालन पूर्ण निष्ठा से करने वाला योगी राज पुरुष भी विचलित हो जायेगा ! याद रखिये उन्हें ही पप्पू फेंकू आदि उपधियाँ चुनाव से पहले ट्वीटर पर देती जाती रही है ,जन संभावनाओं के युग को पलटने दीजिये !इतनी जल्दी लोग अपना घर भी नही ठीक क्र पाते है ये तो एक महा देश है ! महती जनसंख्या बहु विचार धारा बहु धर्मावलंबियो का वतन है !पूरी तरह अधोपतन को जाती एक विशाल ज चेतना है !क्षमा करेंगे यदि कुछ अनुचित लिखा हो सादर ”!!…………………………….……………………………………….जो समय की धार मैं नहीं चलता वह नष्ट भ्रष्ट हो जाता है यही राज धर्म होता है | कूप मंडूप मत बने रहो ,यही राज धर्म होता है | ………………………………………………………………….विचारों के मंथन मैं एक धर्म कवि धर्म भी नजर आता है | यह भी राजनीती सा ही नजर आता है | कवि भी भावनाओं के मंथन के लिए शब्दों का एक ऐसा माया जाल रच देता है कि पाठक उसमें गहराई तक डूबते सत्य को भूल जाता है | राजनीती की तरह विचार भी कहीं से चुरा लिए जाते हैं ,शब्द भी कहाँ कहाँ से संग्रह करते व्यूह रचना बना ली जाती है | एक व्यक्ति मैं हजारों सूर्य सी चमक पैदा कर दी जाती है | रूप, चन्द्र को भी धवष्ट कर देता है | कवि किसी को भी रावण या राम सिद्ध करने मैं सक्षम होता है | किसी भी दवा को अमृत सिद्ध कर दिया जाता है | मुर्दे मैं भी जान डाल देने की क्षमता वाली दवा मृत संजीवनी सूरा भी सिद्ध कर दी जाती है | सीधा साधा रूप का वर्णन करते कौन कवि की महत्ता को समझ पायेगा | जब बाजार मैं उत्पाद को बेच नहीं पाये ,किसी को ईश्वर अवतार सिद्ध नहीं कर पाये ,राजा को पराक्रमी नहीं सिद्ध कर पाये तो कैसे समझा जायेगा कि कवि महान है | राजा कैसे सम्राट बन पायेगा | जब राजा स्वरुप, कवि की कल्पनाओं ,उक्तियों से महिमा मंडित होगा तभी जन समुदाय आरती उतारने को लालायित होगा| | …………….महर्षि बाल्मीकि ,तुलसीदास ने रामायण नहीं रची होती ,तो कौन कैसे राम रावण को पहिचान पाता | महाभारत के चरित्रों को मन माकिफ रचने की महान क्षमता भी लेखक की ही रही | कौन अच्छे चरित्र का है कौन चरित्र हीन, यह भी कवि लेखक ही सिद्ध कर सकता है | …………………………………………………………………कवि धर्म एक महान धर्म है जिसके विना प्रकृति शून्य ही होती है | दो आँखों वाले को देखते हुए भी कुछ नजर नहीं आ सकता है जब तक कवि रूप माधुर्य ,पराक्रम का वर्णन नहीं करता है | अंधे धृष्टराष्ट्र को भी दिव्य दृष्टी वाले संजय ने अपनी काब्यीक दृष्टी से महाभारत का सटीक वर्णन किया था | कवि लेखकों की म्हणता महत्ता राजा महाराजा बखूबी जानते रहे थे तभी तो अपने नवरत्नों मैं उनकी स्थापना करना उनका धर्म होता रहा था | सत्य क्या है ….अगर नजर आ गया तो कवि लेखक किस काम का | उपमा कालीदासशय की सी पहिचान नहीं हो पाई तो कैसे कालिदास ….| रूप सौंदर्य की काब्यीक प्रस्तुति यदि कामनाओं का संचार न कर सके तो व्यर्थ ही प्रयास होगा | …………………………………….समय की धार बदली कवि लेखक तो सिर्फ पडा ही सकता है अब तो युग इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का है …. अब तो साक्षात दिखाकर भी कवि की लेखक की कल्पनायें आरती उतरने को भक्ति को लालायित कर रही हैं | सत्य को दिखाकर ,निष्पक्ष रहकर कैसे कोई चैनल पहले स्थान तक जा सकता है ,कुछ तो रास्ता चुनना ही होगा तभी तो राज दरबार की कृपाएं बनी रहेंगी | धन्य हो कवि धर्म ,राज धर्म भी तुम्हारे बिना कुछ नजर नहीं आ सकता | राजा यदि प्रजा के हित के लिए सर्वश्व भी न्योछाबर कर दे ,हरिश्चंद्र सा राज पाठ ,पत्नी पुत्र को भी न्योछाबर कर दे तो भी नगण्य ही होगा यदि कवि लेखक द्वारा वर्णित न हो | किन्तु कवि लेखक द्वारा वर्णित कुकर्म भी सत्कर्म सा पूजक बन जाता है | ………………………………………………...कवि का स्वधर्म यही है इसीलिये कवि अपने स्वधर्म को पालन करते संवेदनाओं को उपजते व्यक्ति को पूजक बना देता है | ब्रह्मा की श्रष्टी भी सार्थक हो जाती है | …………………………………………………………….फ़िल्मी गीतों मैं ही आज से ४० साल पाहिले के गीत …..प्रकृति ,के रूप सौंदर्य , नारी शरीर के रूप सौंदर्य , प्रेम प्यार की अनोखी उपमाएं ,भावनात्मक अभिव्यक्ति सब कुछ मनमोहक था | ……………….क्या हैं आजकल के गीत ,क्या अलंकार हैं ,क्या अनुभूति है | किन्तु फिर भी चलती यही है | यही समय की धार है | ………………………………………………………………..एक कुल है जिसकी परम्पराएँ हैं ,किन्तु वह भी एक सी नहीं रहती समयानुसार बदलती जाती हैं | ऐसे ही आजादी के समय कांग्रेस बनी तो हिन्दू विचारधारा वाली जनसंघ बनी ,समय बदला जनता पार्टी बनी , फिर भारतीय जनता पार्टी ,…| राज धर्म अपनाया तभी तो अपने को बदलते रहे विचार बदले व्यक्ति बदले ,देश बदले ,समश्यायें बदली , तभी तो सत्तारूढ़ हो सके | तब का वर्तमान भूत बन गया है | अब जो वर्तमान है उसमें जीना है ,वर्तमान की परिस्तिथियों मैं जीना है | वर्तमान के अनुसार ही कर्म करना है | भूल जाओ भूत को ,| कुनवा जोड़ना है तो सब कुछ सहना होगा | यही राज धर्म है | ………………………………………………………………………राज धर्म के अनुसार जनसंघ से जनता पार्टी ,भारतीय जनता पार्टी ,वर्तमान भारतीय जनता पार्टी और उनके विचार विभिन्नता सभी कुछ राज धर्मानुसार ही तो बरत रहे हैं ,तो स्वधर्मी ही तो हुए | कौन सा राज धर्म त्यागते सन्यास अपनाया | कवि यदि अपने स्वधर्म अपनाते कविता रच कर महान कहलाता है तो राज धर्म अपनाते हम सब भी स्वधर्मी ही तो कहलायेंगे | यदि हम अपना स्वधर्म त्यागेंगे तभी तो नष्ट भ्रष्ट होंगे | ……………………………………………………..वर्तमान की समयानुसार कविता जो रचनी है तो सर्व रुचिनुसार ,स्वर लय को ध्यान मैं रखते ही रची जाएगी तभी लोक प्रिय हो सकती है | यही सब कुछ राज धर्म मैं भी धयान रखना होगा तभी अश्वमेघ यज्ञ सा अभियान सफल हो सकेगा | ………………………………………………………………………...एक बार फिर गीत सुगम हो जायेंगे और सम्राट के दरबार भी राजधर्म से गुंजायमान हो जायेंगे | ……….……………………..ओम शांति शांति शांति



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Bhola nath Pal के द्वारा
November 22, 2014

श्री हरिश्चंद्र जी !मेरा मकशद किसी को सिद्ध या पूज्य बनाना नहीं और न पद प्रतिष्ठा मान सम्मान से मेरा कुछ लेना देना है i मैं तो बस इतना देखता हूँ की आप क्या कहलवाना चाहते हैं बस वही कह जाता हूँ i मैं क्या कहूँ मुझे समझाइये …………

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    November 25, 2014

    भोला नाथ पाल जी अभिनंदन ,आपकी कविता की भावनाएं मेरे हरिश्चंद्री सत्य से साम्यता प्रदान करती ह्रदय को द्रवित कर रही थी आप जिस सत्य को खोज रहे हैं मैं भी उसी सत्य की खोज मै हूॅ सत्य अहिंसा का बीता युग ,आशा तरंगों का प्राण तार ,जीने का जतन से उपाय ढुॅढता हूॅ ,नामों के झुरमुट से व्याप्त नाम ढुॅडता हूॅ ,सपनों का यथार्थ ढुॅडता हूॅ,राजनेताओं के भ्रम के द्वार ढूॅडता हूॅ एक कवि को अलंकारो के भ्रम जाल से परे सत्य की खोज करते देखता हूॅ एक कवि को सत्य की खोज करना पथ पर किसी साथी का अनुभव करा रहा है । किस धर्म को , किस कर्म को , किस धर्म गुरु को , किस रिस्ते को , किस राजनेता को , किस राजनीतिक पार्टी को ,सत्य मानकर अनुकरण करे । राजनेताओं मै क्या कोई लाल बहादुर शास्त्री सा होगा कवियों मै कबीरदास मिल सकेगे । जितना आपकी खोज मैं डूबो उतना अपने को ही पाता हूॅ आपकी तरह भटकता ओम शांति शांति ही जपता रहता हूॅ

Shobha के द्वारा
November 16, 2014

श्री हरिश्चंद्र बहुत समय बाद आपकी शैली में आपके व्यंग पढ़ने का अवसर मिला व्यंग के बारे में कहते हैं जो सोचने पर विवश कर दे फिर मुस्कराने पर आप ऐसा ही लिखते हैं वैसे मैं जहां तक समझ सकी हूँ मोदी जी का आज कल मुख्य उद्देश्य निवेश लाना है | ग्रोथ रेट बढ़ाना हैं डॉ शोभा

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    November 17, 2014

    शोभा जी अभिवादन मोदी जी महान हैं वो जो कुछ भी करेंगे स्वधर्म ही होगा । किंतु मैं अपने स्वधर्म मै सफल पाता हूॅ जब आपकी शोभा  मुस्करा कर होती है । ओम शांति शांति का आभास हो जाता है । एक लेखक को और क्या चाहिए 

jlsingh के द्वारा
November 16, 2014

तीक्ष्ण कटाक्ष!

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    November 17, 2014

    जवाहर जी आभार तीक्ष्ण लग सकता है किंतु एक मीठा सत्य जो ओम शांति शांति कारक ही होगा 

sadguruji के द्वारा
November 16, 2014

आदरणीय हरिश्चंद्र जी ! सादर अभिनन्दन ! कांग्रेस के प्रति आपका लगाव ही शायद आपके द्वन्द का कारण है ! यदि मोदी जी ने कहा है कि वर्तमान में जीने वाला ही स्वधर्मी है तो उन्होंने गलत नहीं कहा है ! हमारे व्यवहारिक जीवन में न भूत साथ देता है और न भविष्य,वहां तो सिर्फ वर्तमान ही काम देता है ! वस्तुतः जीवन सिर्फ और सिर्फ वर्तमान है ! सभी संत यही बात कहते हैं ! गुजरा हुआ नेता या डॉक्टर इस समय देश का और लोंगो का क्या भला कर सकता है ?मोदी जी की आज यदि बड़ाई हो रही है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं ! देश में जब कांग्रेस के प्रधानमंत्री थे,तब भी तो यही होता था ! किसी की प्रसंशा करना यदि भक्ति है तो उसकी बुराई करना भी किसी अन्य की भक्ति है ! मंच पर वैचारिक उपस्थिति के लिए हार्दिक आभार !

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    November 17, 2014

    सद्गुरु जी सादर अभिवादन ,आप भी भ्रमित हो गये ना ,कवि लेखक की रचना मैं । कवि  लेखक का यही स्वधर्म है कि पाठक उसकी रचना मैं रच बस कर कि्याकलाप करने लग जाये । सब भावनाओं से खेलते हैं । ओम शांति शांति का सुगम मार्ग है । 

shakuntlamishra के द्वारा
November 16, 2014

स्वधर्म की जय हो ,बहुत अच्छा !हरिश्चंद्र जी -ओम शांति

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    November 17, 2014

    शकुंतला जी आभार धर्म के मार्ग मैं प्रोत्साहन  ही मार्ग सुगम कर देता है । बहूत बहुत धन्यवाद । ओम शांति शांति


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