PAPI HARISHCHANDRA

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माननीय जी महाभारत,गीता क्या शिक्षा देंगे ...?

Posted On: 3 Aug, 2014 हास्य व्यंग,Others में

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माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जी का यह बयां की यदि वे ताना शाह होते तो पहिली कक्षा से गीता ,महाभारत अनिवार्य कर देते | क्यों की महाभारत और गीता हमें जीने की कला सिखाते हैं | हमें अपनी प्राचीन परम्पराओं की और लौटना चाहिए | यदि हम उनका अनुकरण करते तो हिंसा और आतंकवाद की समश्यायें नहीं रहती | …………………………………………....माननीय जी क्या भारत का कोई हिन्दू महाभारत से ग्रन्थ को अपने घर मैं रखना चाहेगा | महाभारत की विभीषिका से घबरा कर महाभारत को घर मैं रखना भयावह समझा जाता है | क्या सीख ,मर्यादा मिल सकती है वर्तमान मनुष्यों को महाभारत से …? | क्या भीष्म पितामह से सीख ले सकते हैं जिन्होंने अपने पिता की प्रेयसी से विवाह कराने हेतु, भीष्म प्रतिज्ञा की ,और जीवन पर्यन्त अविवाहित रहे | किन्तु अनैतिक्ताओं के मूकदर्शक रहे | क्या नहीं अत्याचार ,अनैतिकताएं उन्होंने देखीं पांडवों के प्रति | क्या सिर्फ इसलिए की कौरव वैध संतान थे और पांडव अवैध | क्या धृतराष्ट्र से सीख ली जा सकती है जो पुत्र मोह मैं पांडवों पर अधर्म के मूक बने रहे | क्या इसीलिये कि पांडव , उनके भाई की बहु कुंती की अवैध संतान थी | पाण्डु पाण्डु रोग से पीड़ित थे और संतान उत्पन्न करने के अयोग्य थे उनको संसर्ग करना भी प्राण घातक था | पाण्डु की दुसरी पत्नी अपने मैं संयम नहीं रख सकी और पाण्डु काल कलवित हो गए | क्या यही कारण था धृष्टराष्ट्र का मौन धारण का ….? क्या गुरु द्रोणाचार्य द्वारा एकलब्य का अंगूठा गुरु दक्षिणा मैं मांग लेना क्या गुरु की मिशाल है ,जिस गुरु ने कभी एकलव्य को शिक्षा दी ही नहीं | द्रोपदी के पाँच पति होना क्या मर्यादा स्थापित करती है | छल कपट जुआ द्रोपदी चीर हरण क्या सीख देंगे | महान विद्वान विदुर जिनकी नीतियों की सर्वत्र माननीयों मैं गणना होती थी अपनी उत्पत्ति से क्या मर्यादा देंगे | कर्ण की उत्पत्ति और अंत तक भावनात्मक दोहन कर किया अंत, क्या मिशाल देगा | अकेले अभिमन्यु चक्रव्यूह मैं घेरकर निहत्ते होने पर मारना , अंत क्या सिद्ध करेगा | घटोत्कच की उत्पत्ति और अंत क्या मिशाल देगा | धर्म युद्ध कहे जाने वाले महाभारत मैं अधर्म की ही जय होती रही | दो मामाओं ने धर्म की अपने अपने तरीके से व्याख्या करके अपने अहं की खातिर धर्म को गुड गोबर कर दिया | अधर्म को धर्म सिद्ध करना कूटनीतिज्ञों और लेखकों का कार्य रहा | क्या धर्म है क्या अधर्म यह समझा ही नहीं जा सकता वर्तमान परिपेक्ष मैं तो क्या शिक्षा पाएंगे | ……………………………….…….जिस महाभारत का नाम लेना भी भय का कारण बन जाता है उसे सिर्फ सीरियलों मैं या फिल्मों मैं देखना ही ज्ञान बर्धक हो सकता है किन्तु बाल सुलभ मन को भ्रमित ही करते महाभारत ही रच सकता है | पूरे विश्व की १८ अक्सोहिनी सेना के साथ सर्वनाश करने वाली महाभारत की गाथा बाल मन मैं क्या शांती सन्देश देगी | कुछ भी अनैतिक करो उसे नैतिक सिद्ध कर दो | यही जीतने वाले की राजनीती होती आई है | क्या राजनीती सीखना ही उद्देश्य होगा | …………..….युद्ध के प्रारम्भ मैं अपने ही नाते रिश्तेदारों ,मित्रों , को देखकर .जो अर्जुन कुलके होने वाले नाश से इतना भयभीत हो चूका था कि उसने अपने हथियार रख दिए और युद्ध न करने की ठान ली | शांति के ज्ञाता अर्जुन ने कितने शांति पूर्ण ढंग से अपने विद्वता पूर्ण बचनों से कृष्ण को प्रभावित किया था | कितने नैतिक धर्म मय विचार थे अर्जुन के ………….अर्जुन ने कहा था अपने ही कुटुंब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे ……? यद्यपि लोभ से भ्रष्ट चित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने मैं पाप को नहीं देखते तो भी हे जनार्दन ..कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिए क्यों नहीं विचार करना चाहिए ….? कुल के नाश से सनातन धर्म नष्ट हो जाते हैं ,धर्म के नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल मैं पाप भी बहुत फैल जाता है ,पाप के अधिक फैल जाने से कुल की स्त्रियां दूषित हो जाती हैं ,स्त्रीयों के दूषित हो जाने पर वर्ण शंकर संतान होती हैं | वर्ण शंकर कुलघातियों और कुल को नरक मैं ले जाने के लिए ही होता है | इन वर्ण शंकरात्मक दोषों से कुल घतियों के सनातन कुल धर्म और जाति धर्म नष्ट हो जाते हैं || ……………….हा शोक ….हम लोग बुद्धिमान होकर भी पाप करने को तैयार हो गए हैं ,जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनो को मारने को तैयार हो रहे हैं | ………………….इतने धर्म मय समझदारी वाले विचारों को कृष्ण ने किस तरह अपनी कुशल वाक शक्ति से बार बार धर्म ,योग , अध्यात्म ,विराट स्वरुप से सम्मोहित कर ,भयभीत कर युद्ध करवा ही दिया और सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करते विजय पाई | किन्तु यह बाल सुलभ मन पर क्या प्रतिक्रिया छोड़ेंगे क्या बाल मन महसूस करेगा …? क्या उसने राजनीती मैं जाकर राज्य करना है …? शांति स्थापित करना है | त्याग करना …| या सब कुछ त्याग कर सिर्फ भक्ति ही करनी है | क्या मर्यादाएं होंगी …….? क्या शिक्षा ग्रहण करेंगे बाल मन …..? त्याग करके भक्ति करने वाले क्या सन्यासी बन जाएँ ,यही शिक्षा मिलेगी बाल मन को या शस्त्र उठकर महाभारत रच दें …? …………………………धर्म आत्म शांती है | कर्म जीव का स्वाभाव है | किन्तु शिक्षा एक मार्ग है जिससे अपना जीवन और लक्ष्य सुगम कर सकते हैं | …………………………………..इसीलिये तानाशाही राज शाही का अंत हुआ | विचार उत्पन्न होना और उसको कार्यान्वित कर देना ही ताना शाह का काम होता है | भगवन की कृपा से अब तानाशाही नहीं है ………..…..ओम शांति शांति शांति



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
August 5, 2014

आप को तो महाभारत और गीता का बहुत गहन ज्ञान है आदरणीय |

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    August 5, 2014

    दुबे जी आभार ,महाभारत गीता के बिना भारत की कल्पना भी नहीं हो सकती । ईसी लिए तो माननीय जी ने इनका ज्ञान पाठ्यक्रम मै आवष्यक करना चाहा । इसको ओम शांति शांति का जप करते करते ही पडना पडता है 

Shobha के द्वारा
August 4, 2014

हरिश्चन्द्र जी आपका काफी समय बाद लेख देखने को मिला मैं आपको केवल एक प्रसंग का ही उदाहरण दूँगी आज के परिवेश में पिता अँधा था मतलब अपने व्यपार में मस्त और माँ ने भी बच्चों से उदासीन हो कर आखं पर पट्टी बांध ली बच्चे बेमुहार अभी तो जी लें आज के बच्चों को आप देख लें महाभारत पूरी कूटनीति और समाज शास्त्र है परिवार मे पढने की इजाजत क्यों नही थी वह इंसानी रिश्तों की चालाकी से परिबार को बचा कर रामायण का आदर्श पात्र बनाना चाहते थे |गीता में आपने कर्म का सिद्धांत नही पढ़ा कर्म वाद कर्म करो आज हम गीता भूल गये है साधन की पवित्रता के स्थान पर पैसा बस पैसा कैसा भी पैसा और मौज चोरी डकैती रेप मन पर संयम नदारद| कुछ वर्ष पहले हमने पहली बार गीता खरीदी पढ़ी दो बार समझ ही नहीं आई फिर धीरे- धीरे समझ आई भारत के जितने भी धर्म है यहाँ तक तक बुद्ध धर्म भी गीता से अलग नहीं है गोतम बुद्ध का पूरा जीवन दुख क्या है की खोज में रहा कर्म और ज्ञान का क्रियात्मक रूप बुद्ध धर्म है एक जर्मन हमे मिला हम लोगों ने पूछा आप यहाँ घूमने आते हो उसने कहा आपकी फिलोसफी जानने आते हैं आप की अपनी क्रिश्चियनटी है उन्होंने कहा जिन प्रश्नों के उत्तर हमे कहीं नहीं मिलते उनका जबाब गीता में मिलता हैगीता हमारे पूर्ण वेद की शोर्ट फॉर्म है बच्चों को यदि सुधारना है तो हमे उनको संस्कृति से जोड़ना पड़ेगा नहीं तो अमेरिकन समाज के समान सब अय्याशी कर हमारी सन्तति पीठ पर झोला रख कर पलायन वाद की और चल देगी | कृपया आप मुझे क्षमा करें हमारे मनीषियों ने समाज का एक एक नियम बहूत सोच कर बनाया था तभी हम जिन्दा हें अब हमारी संस्कृति की जड़ को काटा जा रहा हें डॉ शोभा

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    August 4, 2014

    डा शोभा जी आभार 

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
August 3, 2014

धर्म आत्म शांती है | कर्म जीव का स्वाभाव है | किन्तु शिक्षा एक मार्ग है जिससे अपना जीवन और लक्ष्य सुगम कर सकते हैं | …आपके सम्पूर्ण आलेख में एक एक शब्द सत्य की कसौटी पर खरा उतरता है आदरणीय हरिश्चंद्र जी,घरों में उस चित्र को लगाने में भी वास्तु दोष मानते हैं जिसमे श्री कृष्ण जी अर्जुन को  गीता का ज्ञान दे रहे है कारण कि वो युद्द भूमि का चित्र है (उससे परिवार में क्लेश होता है  ) .फिर बच्चो की शिक्षा में महाभारत को शामिल करना कहाँ तक जायज हो सकता है .उम्दा आलेख .

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    August 4, 2014

    निर्मला जी आभार 

nishamittal के द्वारा
August 3, 2014

सुन्दर सटीक व्यंग्य

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    August 4, 2014

    आभार निशा जी 

sadguruji के द्वारा
August 3, 2014

आदरणीय हरिश्चंद्र जी ! एक सौ ग्यारहवीं रचना की बधाई ! बच्चे महाभारत पढ़ पहले राजनीती करना सीखें और बाद में गीता पढ़कर सन्यासी बन जाएँ ! ज्यादा अच्छा तो यही रहेगा ! आपका व्यंग्य लेख पढ़ मुस्कुराने को मिला ! बहुत बहुत आभार !

    PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
    August 3, 2014

    सद्गुरु जी आप आये बहार आई और आपकी मुस्कराहट ने लेख को सार्थकता प्रदान कर दी आभार ओम शांति शांति 


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