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अमंगल भवन मंगल हारी ? एक और खजाने की ओर

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४५० .करोड़ की सम्भावित लागत ,सफलता की सम्भावनाएं ३० से ३५ प्रतिसत ? ,इसरो प्रमुख राधाकृष्णन के अनुसार यह एक जटिल मिशन है ,पहली बार में कोई सफल नहीं हुआ ,,,,,,.क्या भारत जैसा देश जहाँ ८० प्रतिसत जनता अपने जीवन यापन की साधारण आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाता है गरीबी ,अशिक्षा मुँह फैलाये जा रही है ,,…….साइंस ,टेक्नोलोजी में विकशित राष्ट्रों के पिछलग्गू हैं ,लड़ाकू हथियारों ,विमानों ,टैंकों ,पनडुब्बियों ,में लक्ष पाना एक सपना ही है ,रूपये की हालत ,अर्थव्यवस्था की गम्भीरता ,अनियत्रित होती जा रही है ,…………………………………………….,,,,,,,,,,..ऐसे में मंगल की ओर देखना क्या बुद्धिमत्ता होगी जिस ओर देखते हमारी टोपी ही गिर जाये ,क्या हमारे देश की आर्थिक स्तिथि ऐसी है कि हम विकसित राष्ट्रों की बराबरी करते प्रतिस्पर्धा करें ,जिस की सफलता की सम्भावनाएं ३० प्रतिसत ही हों ,क्या देश झेल पायेगा यह सब ? डेढ़ अरब की आबादी क्या अपना पेट काट कर इस अभियान को पोषित करती रहेगी ? या मिशन अधूरा छोड़ा जायेगा ? या भीख मांगनी पढ़ जायेगी ?………………………..क्यों हमारे देश की सरकार ऐसे खजानों का लालच करती है जो सामर्थ से वाहर होंगे ?क्यां सपनों में जीना बुद्धिमानी होगी कि हम चौथे मंगल अभियान के देश बन जायेंगे ? ……………………………………………………………………………………..दुनियां में आबादी में दूसरा सबसे बढ़ा देश जिसका क्षेत्रफल बढे विकसीत देशों से कम है संसाधन कम हैं ,आर्थिक स्तिथी विकासशील ही है ,ऐसे में यह एक ब्लफ जुआ ही नहीं होगा ?………………….एक साधारण वेतन भोगी परिवार में किसी एक मद में ज्यादा खर्चा करना पड़ता है तो ये चिंता स्वभाविक होती है की कैसे चलेगा घर का खर्च ?.जब कि और खर्चे मुंह चिढ़ा रहे हैं ,………………………………………………………………………………………………………क्या २००८ के चुनाओं की तरह आम चुनाओं से पहले चंद्रयान १ की लांचिग कर , इस अभियान का .भी चुनावी मंगल का लाभ तो नहीं लेना चाहेगी सरकार , जिस अभियान की पूर्णावधि 2014 के अंत तक होनी है ,,…..अभी तो एक उपलब्धी मान कर ही चलेगी सरकार ,,चाहे इसके लिए गरीब अपने हिस्से कि एक रोटी कम खाएं या कम पहिनें ,या और साधारण जन सुविधओं या आवश्यकताओं को कम करें ,………………………………….साधारण जन को तो यही लगेगा ………………………………..अमंगल भवन मंगल हारी,…………………………………….या एक और खजाने की खोज ………………………………………………………………………बाकि हरी इच्छा’ ….’; मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहुश दशरथ अजर विहारी……………………………………. भगवान स्वप्ना को साकार करे ,,,.मंगल ही मंगल हो ,,खजाना ही खजाना हो ,,,,,,,,,,,भारत फिर सोने की चिड़िया हो ‘,………………………………………………………………………………..ॐ शांति शांति शांति ,..

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
November 7, 2013

आदरणीय हरिश्चंद्र जी,आप के लेख की हेडिंग “अमंगल भवन मंगल हारी ? एक और खजाने की ओर” बहुत आकर्षक है.लेख में जो सवाल आपने उठाये हैं,उनके जबाब नेताओं के पास नहीं हैं.हिंदी फिल्मों की तरह यहाँ पर नेता सपने बेचते हैं.भारत सोने की चिड़िया तो नहीं हाँ सपनों का भारत जरुर बन जायेगा.


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