PAPI HARISHCHANDRA

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पदमश्री ब्यंगकार के पी सक्सेना नाम की,दूसरी आँख भी फूट गयी हिंदी जगत की ,,,,

Posted On: 31 Oct, 2013 हास्य व्यंग,Others में

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श्रद्धांजली ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,बहुत समय से मोतिया बिंदु से परेशान हिंदी ब्यंग धरा को कुछ सुझाई नहीं दे रहा था अचानक एक आँख राजेंद्र यादव नाम की फूटी ,जिसको एक सप्ताह भी नहीं हो पाया कि दूसरी के पी सक्सेना नाम की भी आँख फूट गयी ,अब हिंदी ब्यंग साहित्य अँधा हो गया लगता है ,क्या शैली थी के पी सक्सेना की ? …लोग सुबह सवेरे उठते ही मुंह में सुरती या गिलोरी से पहले न्यूज़ पेपर देखे थे लेकिन न्यूज़ पेपर में भी के पी सक्सेना का कॉलम सबसे पहले देखते मन चंगा करे थे ,फिर चाय की प्याली या सुरती मुंह में डाले उस कॉलम पर चर्चा करे थे ,जैसे तैसे तैयार हो ऑफिस या काम पर जाते और वहाँ भी समय मिलते ही के पी सक्सेना के कॉलम कि चर्चाएं ,,,,,एक वर्ष नहीं वर्षों चलता रहा यह सब बच्चे जवान हो गए ,जवान बड़े ,बड़े भगवन के पास जाकर भी के पी सक्सेना के ब्यांगों को ही तलासते रहे होंगे ,,,जिस दिन यह कॉलम नहीं नज़र आवे था तो सब अधूरा लगे था ,ब्यंग भी ऐसा जो राजनीती से दूर आम जन से हिला मिला और हास्य के पुट से युक्त ,न चुभने वाला हुआ करे था ,,ब्यंग कहने या लिखने वाले की भाव भंगिमा ऐसे होते है कि लोग आक्रोशित हो जाते है लेकिन इनके ब्यंग इन सब से दूर स्वाभाविक होते रहे ,,,यही कारण रहा कि आप विवादों से दूर सर्वप्रिय रहे,,,,”,,,बीबी नातिनों वाली ,,”, जैसे प्रसिद्ध दूरदर्सन सीरियल के लेखक रहे ,,,,…………………हलचल ,लगान,स्वदेश ,जोधा अकबर ,जैसी सुपरहिट फिल्मों के डायलॉग लिखे ,हिंदी के ही नहीं, उर्दू, अवधी के भी महारथी थे ,,,, ,पद्मश्री से सम्मानित ,,,,,,ऐसे थे के पी सक्सेना पद्मश्री ,,,,,………………………………,बरेली जन्म भूमि होने के कारण उनकी यादें जैसी ही मेरी यादें रहीं ,उनके प्रति असीम लगाव ही का असर मेरे ऊपर रहा ,मेरा बोल चाल लेखन शैली ब्यंगात्मक ही रही ,,,,,,,,,,अब शायद हिंदी ब्यंग साहित्य ही नहीं, में भी अँधा हो गया हूँ आंसू नहीं रूक रहे इतने आंसू मेरे माता पिता के देहांत पर भी नहीं निकले अब दीखेगा कुछ नहीं, आंनदमय स्पर्श का अहसास ही करना होगा ,,.साहित्यिक पत्रिकाएं तो पहले ही पलायन कर चुकी हैं या पत्र पत्रिकाएं ब्यंगकारों को उतना महत्व नहीं दे पाती हैं या डरती हैं किसी विवाद से ,,,,,,,एक सूर्य खुसवन्त सिंह का धूप सा अहसास ही रह गया है,,,,,,,,,,,,,” न काहू से दोस्ती न कहू से बैर “,,,,,,,,,वह भी कितना साथ देगा ,,काटूनिस्ट रूपी हाथ गया ,राजेंद्र यादव ,के पी सक्सेना सी आँखें ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,भगवान इनकी आत्माओं को शान्ति दें ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,भगवन से प्रार्थना है कि जल्द ही ऐसी प्रतिभाओं को पुनर्जन्म देकर हिंदी को हाथ और आँखों से युक्त करें ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,ॐ शांति शांति शांति ,,,,,,,,,,,………………………………………………………………………

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
November 6, 2013

सुन्दर जानकारी देता लेखन ! केपी सक्सेना जी को हार्दिक श्रद्धांजलि !

Dr MEERA के द्वारा
November 5, 2013

आदरणीय हरिश्चंद्र जी ,पद्मश्री के पी सक्सेना को उन्हीं कि व्यगत्मक शैली में श्रदांजली बहुत सुन्दर लगी बधाई

deepakbijnory के द्वारा
November 3, 2013

आदरणीय हरीश चन्द्र जी इसी इंतजार में था कोई तो के पी सिंह के बारे में लिखे अपने लिखकर हैम सभी को कृतार्थ किया धन्यवाद्

Santlal Karun के द्वारा
November 1, 2013

आदरणीय हरिश्चंद्र जी, आप का आलेख के.पी. सक्सेना की स्मृति को ताज़ा कर गया | वे व्यंग्यकारों के व्यंग्यकार थे | व्यंग्य विधा का ऐसा पुरोधा हिन्दी जगत में दूसरा नहीं | संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के श्रेष्ठ से श्रेष्ठ लेखक तो अनेक हैं, किन्तु हिन्दुस्तानी की तीखी-तिरछी धार जो के.पी. सक्सेना में मिलती है, अन्यत्र दुर्लभ है | आप की यह प्रेक्षा कितनी सटीक है — “अचानक एक आँख राजेंद्र यादव नाम की फूटी ,जिसको एक सप्ताह भी नहीं हो पाया कि दूसरी के. पी. सक्सेना नाम की भी आँख फूट गयी |” इस स्मृतिपरक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

jlsingh के द्वारा
November 1, 2013

भाव भीनी श्रद्धांजलि के अलावा हैम कर भी काय सकते हैं. विधाता के यहाँ भी ऐसे लोगों की ही मांग रहती है!


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